शनिदेव की आरती
जय जय श्री शनिदेव
Jai Jai Shri Shani Dev
आरती लिरिक्स
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी॥
जय जय श्री शनिदेव॥
श्याम अंग वक्र दृष्टि, चतुर्भुजा धारी।
नीलाम्बरधर नीलज, छवि अति सुखकारी॥
जय जय श्री शनिदेव॥
किरीट मुकुट छवि राजत, दीपत अद्भारी।
कुण्डल श्रवण विराजत, कण्ठमाल भारी॥
जय जय श्री शनिदेव॥
मोदक मिष्ट पदारथ, भोग भरें भारी।
करें सेल भू-खण्डन, नर-नारी हारी॥
जय जय श्री शनिदेव॥
सूर्यपुत्र शनि देव की आरती जो कोई गावे।
कहत कवि सुन्दरदास, अभीष्ट वर पावे॥
जय जय श्री शनिदेव॥
लोह दान देने वाला, शनि कृपा पावे।
उड़द तिल तेल का दीपक, आरती में लावे॥
जय जय श्री शनिदेव॥
नील वस्त्र नील पुष्पन, शनि को चढ़ावे।
शनि की साढ़े साती, दुख दूर करावे॥
जय जय श्री शनिदेव॥
छाया सुत सूर्य नन्दन, कर्म फल दाता।
पापियन को दण्ड देता, साधुन सुखदाता॥
जय जय श्री शनिदेव॥
आरती का अर्थ एवं महत्व
शनिदेव सूर्यपुत्र और कर्मफल दाता हैं। उनकी आरती शनिवार और शनि जयंती पर विशेष रूप से गाई जाती है। यह आरती शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती है। तिल, तेल और उड़द का दान शनि कृपा प्राप्ति का उपाय है।
🙏 यह आरती परिवार और मित्रों के साथ शेयर करें — पुण्य प्राप्त करें