पापांकुशा एकादशी व्रत कथा
Papankusha Ekadashi Vrat Katha
संक्षिप्त उत्तर
पापांकुशा एकादशी आश्विन शुक्ल पक्ष में दशहरे के समीप आती है। "पाप + अंकुश" अर्थात् पापों पर अंकुश (नियन्त्रण) लगाने वाली। भगवान विष्णु की पूजा और व्रत से जीवन भर के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है।
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा — संपूर्ण कथा
ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार विंध्य पर्वत के निकट एक घोर पापी शिकारी रहता था। वह प्रतिदिन निरीह पशु-पक्षियों का वध करता, चोरी करता और सदा पाप-कर्मों में लिप्त रहता था। उसने कभी किसी देवता की पूजा नहीं की थी और न ही कभी व्रत-उपवास रखा था। उसका सम्पूर्ण जीवन अधर्म में बीता।
एक बार आश्विन शुक्ल एकादशी के दिन वह शिकारी जंगल में शिकार खोज रहा था। उस दिन उसे कोई शिकार नहीं मिला और वह थका-माँदा एक तालाब के किनारे एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गया। भूख-प्यास से व्याकुल होकर उसने सारा दिन और रात वहीं बिताई — अनजाने में उपवास हो गया।
उस पीपल के वृक्ष के नीचे एक प्राचीन शिवलिंग था और समीप ही तुलसी का पौधा था। रात्रि में ठण्ड से बचने के लिए शिकारी ने पीपल के पत्ते तोड़-तोड़कर शिवलिंग और तुलसी के पास रखे। वह अनजाने में रात्रि जागरण कर रहा था और शिवलिंग के समीप बैठा पत्ते चढ़ा रहा था।
इस प्रकार बिना जाने एकादशी का उपवास, रात्रि जागरण और तुलसी-पत्र का अर्पण — ये तीनों पुण्य कर्म हो गए। अगले दिन प्रातःकाल शिकारी ने तालाब का जल पीया — यह अनजाने में द्वादशी का पारण हो गया। पापांकुशा एकादशी के व्रत का पुण्य उसे अनायास प्राप्त हो गया।
कुछ वर्षों पश्चात् जब उस शिकारी की मृत्यु हुई, तो यमदूत उसे लेने आए। किन्तु उसी समय विष्णु के दूत भी दिव्य विमान लेकर आ गए। यमदूतों और विष्णुदूतों में वाद-विवाद हुआ। विष्णुदूतों ने कहा कि इस जीव ने पापांकुशा एकादशी का व्रत किया है, अतः इसके समस्त पाप नष्ट हो चुके हैं।
यमराज ने जब अपने लेखा-जोखा में देखा तो पाया कि सचमुच पापांकुशा एकादशी के पुण्य ने उसके जीवन भर के पापों को जला दिया है। यमराज ने शिकारी को मुक्त कर दिया और वह विष्णुदूतों के साथ दिव्य विमान में बैठकर वैकुण्ठ धाम चला गया।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा — "हे युधिष्ठिर! जब अनजाने में किए गए व्रत का इतना फल है, तो जो मनुष्य श्रद्धा और विधि-विधान से पापांकुशा एकादशी का व्रत करता है, उसके पुण्य का वर्णन करना भी कठिन है। यह एकादशी पापों के अंकुश समान है — सभी पापों को वश में करती है।"
संदर्भ: ब्रह्म वैवर्त पुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को पापांकुशा एकादशी का माहात्म्य सुनाया है। इसमें एक पापी शिकारी के उद्धार की कथा वर्णित है।
ऑडियो कथा सुनें
आश्विन शुक्ल पक्ष को भगवान विष्णु (पद्मनाभ) की पूजा कैसे करें?
प्रातः स्नान और संकल्प
ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें। शुद्ध वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु के समक्ष बैठें। पापांकुशा एकादशी व्रत का संकल्प लें — "भगवान पद्मनाभ की प्रसन्नता और पापनाश हेतु मैं यह व्रत रखता/रखती हूँ।"
भगवान विष्णु की षोडशोपचार पूजा
भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराएं। पीतांबर पहनाएं, तुलसी दल और कमल पुष्प चढ़ाएं। चन्दन, कुमकुम, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
विशेष पूजन — अंकुश अर्पण
इस एकादशी पर भगवान को सोने या चाँदी का अंकुश (प्रतीकात्मक) अर्पित करें। यदि यह सम्भव न हो तो अक्षत से अंकुश बनाकर अर्पित करें। यह पापों पर अंकुश का प्रतीक है।
मंत्र जाप
भगवान विष्णु के मंत्र "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का 108 बार जाप करें। विष्णु सहस्रनाम या भगवान के अन्य स्तोत्रों का पाठ करें।
कथा श्रवण और रात्रि जागरण
सायंकाल पापांकुशा एकादशी की कथा सुनें। रात्रि में भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करें। तुलसी की माला से जाप करें।
पारण और दान
द्वादशी को प्रातः स्नान के बाद भगवान की पूजा करें। ब्राह्मण भोजन कराएं। वस्त्र, फल और दक्षिणा का दान करें। फिर स्वयं भोजन करके पारण करें।
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा में क्या सामग्री चाहिए?
📿 मंत्र
ॐ पद्मनाभाय नमः
कमलनाभ भगवान विष्णु को नमस्कार है। जिनकी नाभि से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए, ऐसे सृष्टिकर्ता को मेरा प्रणाम।
📿 अन्य मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
ॐ विष्णवे नमः
ॐ नमो नारायणाय
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा के नियम
- • दशमी को सायंकाल हल्का सात्विक भोजन करें
- • एकादशी को फलाहार या निर्जल व्रत रखें
- • किसी भी प्रकार का पाप-कर्म न करें
- • सत्य बोलें और दूसरों की निन्दा न करें
- • भगवान विष्णु का निरन्तर स्मरण करें
- • रात्रि जागरण करें
- • द्वादशी को दान-पुण्य करके पारण करें
✅ क्या खाएं
- → फल — सेब, केला, अनार, पपीता
- → साबूदाना की खिचड़ी या खीर
- → सिंघाड़े का आटा
- → मखाने और सूखे मेवे
- → दूध और दही
- → आलू और कद्दू
- → नारियल पानी
❌ क्या न खाएं
- ✗ चावल — एकादशी पर सर्वथा वर्जित
- ✗ दालें और अनाज
- ✗ प्याज और लहसुन
- ✗ माँसाहार और मदिरा
- ✗ तला-भुना और मसालेदार भोजन
- ✗ बासी भोजन
- ✗ तम्बाकू और नशीले पदार्थ
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा के लाभ
- • जीवन भर के सम्पूर्ण पापों का नाश होता है
- • अनजाने में किए गए पापों से भी मुक्ति मिलती है
- • वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है
- • यमलोक के भय से मुक्ति मिलती है
- • मन को शान्ति और आत्मा को सुख प्राप्त होता है
- • कुल में पुण्य और यश की वृद्धि होती है
- • दशहरे के समीप होने से बुराई पर विजय का पुण्य मिलता है
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पापांकुशा एकादशी का नाम ऐसा क्यों पड़ा?
"पाप" अर्थात् पाप और "अंकुश" अर्थात् नियन्त्रण करने वाला हथियार (हाथी को नियंत्रित करने का उपकरण)। जैसे अंकुश हाथी को वश में करता है, वैसे ही यह एकादशी पापों को वश में करके नष्ट करती है।
क्या यह एकादशी दशहरे से सम्बन्धित है?
पापांकुशा एकादशी आश्विन शुक्ल पक्ष में आती है जो दशहरे (विजयादशमी) के एक दिन बाद होती है। दशहरा बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व है और यह एकादशी पापों पर विजय का व्रत है — दोनों में गहरा सम्बन्ध है।
क्या अनजाने में किया गया व्रत भी फल देता है?
हाँ, कथानुसार एक पापी शिकारी ने अनजाने में यह व्रत किया और उसे वैकुण्ठ प्राप्त हुआ। परन्तु श्रद्धा और विधिपूर्वक किए गए व्रत का फल असीमित रूप से अधिक होता है।
पापांकुशा एकादशी पर कौन सा दान करना चाहिए?
इस एकादशी पर अन्नदान, वस्त्रदान और गोदान का विशेष महत्व है। ब्राह्मणों को भोजन कराना और दक्षिणा देना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
क्या यह व्रत महिलाएं भी रख सकती हैं?
हाँ, यह व्रत स्त्री-पुरुष दोनों के लिए समान रूप से फलदायी है। सभी वर्णों और आश्रमों के लोग इसे रख सकते हैं।
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