मोहिनी एकादशी व्रत कथा
Mohini Ekadashi Vrat Katha
संक्षिप्त उत्तर
मोहिनी एकादशी वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है जो भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार को समर्पित है। इस व्रत से समस्त मोह-माया का नाश होता है और जीव को संसार के बंधनों से मुक्ति मिलती है। फलाहार करते हुए विष्णु पूजन करें।
मोहिनी एकादशी व्रत कथा — संपूर्ण कथा
प्राचीन काल में भद्रावती नगर में धनपाल नामक एक वैश्य रहता था। धनपाल परम धार्मिक और सदाचारी पुरुष था। उसका व्यापार दूर-दूर तक फैला हुआ था और नगर में उसकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। धनपाल के पाँच पुत्र थे जो सभी गुणवान और आज्ञाकारी थे, परंतु उसका सबसे छोटा पुत्र धृष्टबुद्धि अत्यंत दुराचारी और कुमार्ग पर चलने वाला था।
धृष्टबुद्धि जुआ खेलना, मद्यपान करना, परस्त्रीगमन और अन्य पापकर्मों में लिप्त रहता था। वह पिता के धन को बुरे कार्यों में व्यय करता और सज्जनों का अपमान करता था। उसके दुराचार से धनपाल को बहुत दुःख होता था। पिता ने बहुत समझाया, परंतु धृष्टबुद्धि पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था।
अंततः धनपाल ने धृष्टबुद्धि को घर से निकाल दिया। धृष्टबुद्धि निर्धन और दरिद्र होकर जंगलों में भटकने लगा। भूख-प्यास से व्याकुल वह चोरी और लूटपाट करने लगा। एक दिन राजा के सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और बंदी बनाकर नगर की सीमा से बाहर छोड़ दिया।
भटकते हुए धृष्टबुद्धि एक दिन कौण्डिन्य ऋषि के आश्रम में पहुँच गया। ऋषि ने उसकी दयनीय दशा देखकर करुणावश उसे अपने पास बिठाया और उसका वृत्तांत सुना। धृष्टबुद्धि ने अपने समस्त पापकर्म ऋषि के समक्ष स्वीकार किए और पश्चात्ताप किया।
कौण्डिन्य ऋषि ने कहा — "हे वत्स! तुम्हारे पापों का प्रायश्चित्त संभव है। वैशाख शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी का व्रत करो। यह एकादशी भगवान विष्णु के मोहिनी रूप को समर्पित है और समस्त मोह तथा पापों का नाश करने वाली है। इस एकादशी के प्रभाव से ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं।"
धृष्टबुद्धि ने श्रद्धापूर्वक ऋषि की आज्ञा मानी और विधिपूर्वक मोहिनी एकादशी का व्रत किया। दशमी को एक समय भोजन किया, एकादशी को निराहार रहकर भगवान विष्णु का पूजन किया और द्वादशी को ब्राह्मणों को भोजन कराकर पारण किया।
व्रत के प्रभाव से धृष्टबुद्धि के समस्त पाप नष्ट हो गए। उसकी बुद्धि शुद्ध हो गई और उसमें सात्विक गुणों का उदय हुआ। वह अपने पिता के पास लौटा, धनपाल ने पुत्र के परिवर्तन को देखकर उसे पुनः स्वीकार किया। धृष्टबुद्धि ने आजीवन धर्म का पालन किया और अंत में विष्णुलोक को प्राप्त हुआ।
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा — "हे राजन! जो मनुष्य मोहिनी एकादशी का व्रत श्रद्धा और विधि से करता है, उसके सहस्रों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह एकादशी संसार के मोह-बंधन से मुक्ति दिलाने वाली है। इसकी कथा सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।"
संदर्भ: मोहिनी एकादशी की कथा सूर्य पुराण में वर्णित है। भगवान श्रीकृष्ण ने यह कथा युधिष्ठिर को सुनाई थी।
ऑडियो कथा सुनें
वैशाख शुक्ल पक्ष को भगवान विष्णु (मोहिनी अवतार) की पूजा कैसे करें?
दशमी को तैयारी
दशमी तिथि को एक समय सात्विक भोजन करें। संध्या काल में भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। रात्रि में भूमि पर शयन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
प्रातःकाल स्नान और पूजा स्थल की सजावट
एकादशी को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। पूजा स्थल पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु की मूर्ति या शालिग्राम स्थापित करें। पीले पुष्पों से सजावट करें।
षोडशोपचार पूजन
भगवान विष्णु का षोडशोपचार पूजन करें। चंदन, तुलसी दल, पीले पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित करें। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करें।
कथा श्रवण और जागरण
मोहिनी एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें। संपूर्ण दिन भगवान विष्णु के नामों का स्मरण करें। रात्रि में विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हुए जागरण करें।
द्वादशी को पारण
द्वादशी तिथि को ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा देकर पारण करें। तुलसी दल मिश्रित जल पीकर व्रत खोलें। यथाशक्ति दान-पुण्य करें और भगवान विष्णु का धन्यवाद करें।
मोहिनी एकादशी व्रत कथा में क्या सामग्री चाहिए?
📿 मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
सर्वव्यापी भगवान वासुदेव (विष्णु) को मेरा नमस्कार है। यह द्वादश अक्षरी मंत्र समस्त मोह और अज्ञान का नाश करता है।
📿 अन्य मंत्र
ॐ विष्णवे नमः
ॐ मोहिन्यै विद्महे विष्णुरूपिण्यै धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्
ॐ नमो नारायणाय
मोहिनी एकादशी व्रत कथा के नियम
- • दशमी तिथि से ही सात्विक आचरण करें
- • एकादशी को चावल का सेवन बिलकुल न करें
- • व्रत में क्रोध, असत्य और निंदा से बचें
- • ब्रह्मचर्य का पालन करें
- • तामसिक भोजन — प्याज, लहसुन, मांस, मद्य पूर्णतः वर्जित है
- • भूमि शयन करें और विलासिता का त्याग करें
- • द्वादशी को पारण अवश्य करें, उपवास आगे न बढ़ाएं
✅ क्या खाएं
- → फल — केला, सेब, अनार, पपीता
- → साबूदाना खिचड़ी या साबूदाना खीर
- → सेंधा नमक में बनी सब्जियाँ (आलू, कद्दू, अरवी)
- → कुट्टू का आटा या सिंघाड़े का आटा
- → दूध, दही, मक्खन
- → मेवे — मूँगफली, काजू, बादाम, अखरोट
- → शकरकंद और मखाने
❌ क्या न खाएं
- ✗ चावल और चावल से बने पदार्थ
- ✗ गेहूँ, जौ और अन्य अनाज
- ✗ दालें और फलियाँ
- ✗ प्याज, लहसुन और हींग
- ✗ मांस, मछली, अंडा
- ✗ शराब और अन्य नशीले पदार्थ
- ✗ साधारण नमक (सेंधा नमक प्रयोग करें)
मोहिनी एकादशी व्रत कथा के लाभ
- • समस्त मोह और माया का नाश होता है
- • सहस्रों जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है
- • बुद्धि शुद्ध और सात्विक होती है
- • संसार के बंधनों से छुटकारा मिलता है
- • वाजपेय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है
- • अंत में विष्णुलोक की प्राप्ति होती है
- • परिवार में सुख-शांति आती है
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मोहिनी एकादशी का नाम मोहिनी क्यों है?
भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन के समय मोहिनी रूप धारण करके देवताओं को अमृत का पान कराया था। इसी मोहिनी अवतार के नाम पर इस एकादशी का नाम मोहिनी एकादशी है। यह व्रत मोह-माया के बंधनों से मुक्ति दिलाता है।
क्या मोहिनी एकादशी पर निर्जल व्रत करना अनिवार्य है?
नहीं, मोहिनी एकादशी पर निर्जल व्रत अनिवार्य नहीं है। आप फलाहार कर सकते हैं। जल, दूध और फल ग्रहण कर सकते हैं। केवल अन्न का त्याग करना आवश्यक है।
मोहिनी एकादशी व्रत कितने वर्ष तक करना चाहिए?
शास्त्रों के अनुसार एक बार संकल्प लेकर कम से कम तीन वर्ष या पाँच वर्ष तक यह व्रत अवश्य करें। इसके पश्चात उद्यापन कराकर व्रत का समापन किया जा सकता है, अथवा आजीवन भी कर सकते हैं।
क्या महिलाएं मोहिनी एकादशी का व्रत रख सकती हैं?
हाँ, मोहिनी एकादशी का व्रत स्त्री-पुरुष सभी रख सकते हैं। यह व्रत सभी वर्णों और आश्रमों के लोगों के लिए कल्याणकारी है।
मोहिनी एकादशी पर कौन सा दान करना चाहिए?
मोहिनी एकादशी पर पीले वस्त्र, पीले फल, गौ दान, अन्न दान और ब्राह्मण भोजन कराना विशेष फलदायी माना जाता है।
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