योगिनी एकादशी व्रत कथा
Yogini Ekadashi Vrat Katha
संक्षिप्त उत्तर
योगिनी एकादशी आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है। यह एकादशी योग साधना और आध्यात्मिक उन्नति के लिए विशेष महत्वपूर्ण है। इस व्रत से 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने का पुण्य प्राप्त होता है और शाप से मुक्ति मिलती है।
योगिनी एकादशी व्रत कथा — संपूर्ण कथा
अलकापुरी नगरी में कुबेर के दरबार में हेममाली नामक एक यक्ष सेवारत था। उसका कार्य प्रतिदिन मानसरोवर से पुष्प लाकर भगवान शिव की पूजा के लिए कुबेर को देना था। हेममाली अत्यंत सुंदर था और उसकी पत्नी विशालाक्षी भी अति सुंदरी थी।
एक दिन हेममाली मानसरोवर से पुष्प लेकर लौट रहा था, तभी मार्ग में उसे अपनी पत्नी विशालाक्षी की याद आई। वह कामवश अपने घर चला गया और पत्नी के साथ विलास में लिप्त हो गया। पुष्प लाने में विलम्ब हुआ और उस दिन भगवान शिव की पूजा बिना पुष्पों के रह गई।
जब कुबेर को ज्ञात हुआ कि हेममाली अपने कर्तव्य में कामवश चूक गया है, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए। कुबेर ने हेममाली को शाप दिया — "हे दुष्ट! तू कर्तव्य भ्रष्ट है। मैं तुझे शाप देता हूँ कि तू अपनी सुंदरता और यक्षत्व खो देगा और कोढ़ से पीड़ित होकर पृथ्वी पर भटकेगा। तेरी पत्नी भी तुझसे बिछड़ जाएगी।"
शाप के प्रभाव से हेममाली यक्षलोक से गिरकर पृथ्वी पर आ गया। उसका शरीर कोढ़ से पीड़ित हो गया। वह भयंकर कष्ट भोगता हुआ वनों और पर्वतों पर भटकता रहा। न कोई उसे भोजन देता, न कोई उससे बात करता। वर्षों तक वह इस दयनीय अवस्था में रहा।
भटकते-भटकते एक दिन हेममाली हिमालय पर्वत पर मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में पहुँच गया। मार्कण्डेय ऋषि ने उसकी दुर्दशा देखकर कारण पूछा। हेममाली ने सारा वृत्तांत सुनाया और ऋषि के चरणों में गिरकर मुक्ति की प्रार्थना की।
मार्कण्डेय ऋषि ने कहा — "हे हेममाली! तुम्हारे शाप से मुक्ति का एक उपाय है। आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो। इस एकादशी के प्रभाव से महान से महान पाप और शाप भी नष्ट हो जाते हैं।"
हेममाली ने पूर्ण श्रद्धा और भक्ति से योगिनी एकादशी का व्रत रखा। व्रत के प्रभाव से उसका कोढ़ रोग तत्काल समाप्त हो गया, उसकी सुंदरता लौट आई और वह पुनः यक्षलोक में अपने पद पर स्थापित हो गया। उसकी पत्नी विशालाक्षी भी उसे पुनः प्राप्त हुई।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा — "हे युधिष्ठिर! जो मनुष्य योगिनी एकादशी का व्रत श्रद्धापूर्वक करता है, उसके समस्त पाप नष्ट होते हैं और 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने का पुण्य प्राप्त होता है। यह व्रत आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।"
संदर्भ: योगिनी एकादशी की कथा ब्रह्म वैवर्त पुराण में वर्णित है। भगवान श्रीकृष्ण ने यह कथा धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी।
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आषाढ़ कृष्ण पक्ष को भगवान विष्णु की पूजा कैसे करें?
व्रत संकल्प और तैयारी
दशमी तिथि को एक समय सात्विक भोजन करें। संध्या काल में भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें। मन में दृढ़ निश्चय करें कि कल एकादशी को अन्न ग्रहण नहीं करूँगा।
प्रातःकाल पूजन
ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। भगवान विष्णु की मूर्ति को गंगाजल से स्नान कराएं। तुलसी दल, पीले पुष्प और चंदन अर्पित करें। धूप-दीप जलाएं।
मंत्र जाप
भगवान विष्णु के मंत्र "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का 108 बार जाप करें। ध्यान लगाकर भगवान का स्मरण करें। योग और ध्यान का अभ्यास भी इस दिन विशेष फलदायी है।
कथा श्रवण और जागरण
योगिनी एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें। संध्या काल में पुनः पूजन करें। यथासंभव रात्रि जागरण करें और भजन-कीर्तन करें।
द्वादशी पारण
द्वादशी तिथि को प्रातःकाल ब्राह्मणों को भोजन कराकर और दान देकर पारण करें। भगवान विष्णु को धन्यवाद अर्पित करें।
योगिनी एकादशी व्रत कथा में क्या सामग्री चाहिए?
📿 मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
सर्वव्यापी भगवान वासुदेव को मेरा नमस्कार है। यह मंत्र समस्त पापों और शापों का विनाश करने वाला है।
📿 अन्य मंत्र
ॐ विष्णवे नमः
ॐ नमो नारायणाय
ॐ श्री हरये नमः
योगिनी एकादशी व्रत कथा के नियम
- • दशमी से ही सात्विक आचरण करें
- • एकादशी को अन्न का त्याग करें
- • कामवासना, क्रोध और लोभ पर नियंत्रण रखें
- • ब्रह्मचर्य का पालन करें
- • तामसिक भोजन से दूर रहें
- • कर्तव्य पालन में लापरवाही न करें
- • मन, वचन और कर्म से पवित्र रहें
✅ क्या खाएं
- → फल — केला, सेब, अनार, पपीता
- → साबूदाना की खिचड़ी या खीर
- → कुट्टू या सिंघाड़े के आटे की पूरी या रोटी
- → सेंधा नमक में बनी सब्जियाँ
- → दूध, दही, छाछ
- → सूखे मेवे और मखाने
- → शकरकंद और आलू
❌ क्या न खाएं
- ✗ चावल और चावल से बने पदार्थ
- ✗ गेहूँ, जौ और अन्य अनाज
- ✗ सभी प्रकार की दालें
- ✗ प्याज, लहसुन, हींग
- ✗ मांस, मछली, अंडे
- ✗ मद्य और नशीले पदार्थ
- ✗ साधारण नमक
योगिनी एकादशी व्रत कथा के लाभ
- • 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने का पुण्य प्राप्त होता है
- • समस्त शापों और अभिशापों से मुक्ति मिलती है
- • त्वचा रोगों और कोढ़ जैसे रोगों का नाश होता है
- • आध्यात्मिक उन्नति और योग सिद्धि में सहायता मिलती है
- • कर्तव्य भ्रष्टता के पाप का प्रायश्चित्त होता है
- • मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
योगिनी एकादशी का नाम योगिनी क्यों पड़ा?
इस एकादशी का नाम "योगिनी" इसलिए है क्योंकि यह आध्यात्मिक योग साधना और आत्मिक उन्नति के लिए विशेष रूप से प्रभावशाली मानी जाती है। इस दिन योग और ध्यान का अभ्यास विशेष फलदायी होता है।
क्या योगिनी एकादशी रोग निवारण के लिए प्रभावशाली है?
हाँ, कथानुसार हेममाली को कोढ़ जैसे भयंकर रोग से इसी एकादशी के प्रभाव से मुक्ति मिली। शास्त्रों में कहा गया है कि इस व्रत से त्वचा रोग और अन्य कष्टकारी रोगों का निवारण होता है।
योगिनी एकादशी पर कौन सा दान करना चाहिए?
इस दिन ब्राह्मण भोजन, अन्नदान, वस्त्रदान और फलदान विशेष पुण्यदायी माना जाता है। रोगियों की सेवा और औषधि दान भी इस एकादशी पर विशेष फलदायी है।
क्या इस एकादशी पर ध्यान और योग करना चाहिए?
अवश्य। योगिनी एकादशी पर ध्यान, योग और प्राणायाम का अभ्यास अन्य दिनों की तुलना में कई गुणा अधिक फलदायी होता है। भगवान विष्णु के ध्यान में बैठकर मंत्र जाप करने से आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है।
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