आमलकी एकादशी व्रत कथा

Amalaki Ekadashi Vrat Katha

भगवान श्री विष्णु फाल्गुन शुक्ल पक्ष एकादशी
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संक्षिप्त उत्तर

आमलकी एकादशी फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी है। इस दिन आंवले (आमलकी) के वृक्ष की पूजा का विशेष विधान है क्योंकि इसमें भगवान विष्णु का वास माना जाता है। यह व्रत पापों का नाश करता है और मोक्ष प्रदान करता है। एक सहस्र गोदान के समान पुण्य मिलता है।

आमलकी एकादशी व्रत कथा — संपूर्ण कथा

प्राचीन काल में वैदिश नामक एक नगर था जिस पर राजा चैत्ररथ का शासन था। राजा अत्यंत धर्मात्मा और विष्णुभक्त थे। उनके राज्य में समस्त प्रजा सुखी और संपन्न थी। नगर के बाहर एक विशाल और प्राचीन आंवले का वृक्ष था जिसके नीचे सभी लोग भगवान विष्णु की पूजा करते थे।

प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को राजा और संपूर्ण प्रजा उस आंवले के वृक्ष के नीचे एकत्रित होकर भगवान विष्णु की पूजा करती थी। रात्रि भर जागरण होता, भजन-कीर्तन होता और प्रातःकाल ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता। यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही थी।

एक बार उसी आंवले के वृक्ष के नीचे एक शिकारी आया। वह बड़ा पापी था — प्रतिदिन पशु-पक्षियों का वध करता, मांस खाता और मदिरापान करता। उस रात वह थका हुआ था और वृक्ष के नीचे ही सो गया। रात भर ठंड के कारण वह सो नहीं पाया और जागता रहा।

संयोग से वह रात्रि एकादशी की रात्रि थी। शिकारी ने न तो कुछ खाया और न ही पानी पिया — क्योंकि उसके पास कुछ था ही नहीं। इस प्रकार अनजाने में ही उसने एकादशी का उपवास और आंवले के वृक्ष के नीचे रात्रि जागरण कर लिया। आंवले के पत्ते रात भर उसके शरीर पर गिरते रहे।

प्रातःकाल जब शिकारी जागा तो उसने देखा कि उसका संपूर्ण शरीर दिव्य आभा से चमक रहा है। उसके हृदय में अपने पापों के प्रति पश्चाताप जागा। वह विचार करने लगा कि मैंने जीवन भर कितने पाप किए हैं — कितने निर्दोष प्राणियों की हत्या की है।

उसी क्षण आकाश से एक दिव्य विमान उतरा। भगवान विष्णु के पार्षदों ने शिकारी से कहा — "हे मनुष्य! तूने आमलकी एकादशी का व्रत किया और आंवले के वृक्ष के नीचे रात्रि जागरण किया। इसके पुण्य से तेरे समस्त पाप नष्ट हो गए हैं। अब तू हमारे साथ विष्णुलोक चल।"

शिकारी अत्यंत विस्मित हुआ। उसने कहा — "मैंने तो जाने-अनजाने यह व्रत किया था। मैं तो एक पापी शिकारी हूं।" विष्णुदूतों ने कहा — "आमलकी एकादशी और आंवले के वृक्ष का ऐसा प्रभाव है कि अनजाने में भी यदि कोई यह व्रत कर ले तो उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।"

शिकारी दिव्य विमान पर बैठकर भगवान विष्णु के परम धाम वैकुंठ चला गया। जब राजा चैत्ररथ को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने नगर में और भव्य रूप से आमलकी एकादशी मनाने का आदेश दिया। तभी से आमलकी एकादशी पर आंवले के वृक्ष की पूजा और व्रत की विशेष परंपरा चली आ रही है।

संदर्भ: यह कथा पद्म पुराण में वर्णित है। इसमें वैदिश नगर के राजा चैत्ररथ के राज्य में आमलकी (आंवले) के वृक्ष के माहात्म्य और एक शिकारी की मुक्ति की कथा है।

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फाल्गुन शुक्ल पक्ष को भगवान श्री विष्णु की पूजा कैसे करें?

1

स्नान और संकल्प

प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। व्रत का संकल्प लें — "पापनाश और मोक्ष प्राप्ति हेतु मैं आमलकी एकादशी का व्रत करता/करती हूं।" यदि संभव हो तो आंवले के वृक्ष के नीचे पूजा करें।

2

आंवले के वृक्ष की पूजा

आंवले के वृक्ष के चारों ओर सफाई करें। वृक्ष की जड़ में जल चढ़ाएं। कुमकुम, हल्दी, अक्षत और पुष्प अर्पित करें। वृक्ष के चारों ओर सूत्र (धागा) बांधें। दीपक और धूप जलाएं।

3

विष्णु पूजा

आंवले के वृक्ष के नीचे या पूजा घर में भगवान विष्णु की प्रतिमा की पूजा करें। पंचामृत से अभिषेक करें। तुलसी दल, पीले पुष्प और चंदन अर्पित करें। नैवेद्य में आंवले का मुरब्बा या चूर्ण रखें।

4

कथा श्रवण और परिक्रमा

आमलकी एकादशी की कथा का श्रवण या पाठ करें। आंवले के वृक्ष की सात परिक्रमा करें। प्रत्येक परिक्रमा में "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप करें।

5

रात्रि जागरण

रात्रि भर जागकर विष्णु भजन-कीर्तन करें। यदि संभव हो तो आंवले के वृक्ष के नीचे ही जागरण करें। दीपक जलाकर रखें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।

6

द्वादशी पारण

द्वादशी को सूर्योदय के बाद आंवले के फल या आंवले का जल ग्रहण करके व्रत खोलें। ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा दें। निर्धनों को आंवले का दान करें।

आमलकी एकादशी व्रत कथा में क्या सामग्री चाहिए?

आंवले का फल और आंवले का चूर्ण भगवान विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम पंचामृत सामग्री तुलसी दल और पीले पुष्प चंदन, कुमकुम, हल्दी, अक्षत सफेद सूत्र (धागा) घी का दीपक और अगरबत्ती गंगाजल फल (नैवेद्य हेतु) सुपारी, पान और नारियल

📿 मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

भगवान वासुदेव को नमन। आमलकी एकादशी पर इस मंत्र का जाप आंवले के वृक्ष के नीचे करने से विशेष फल प्राप्त होता है।

📿 अन्य मंत्र

ॐ विष्णवे नमः

ॐ धात्रीश्वराय विद्महे विष्णुप्रियाय धीमहि तन्नो आमलकी प्रचोदयात्

ॐ नमो नारायणाय

आमलकी एकादशी व्रत कथा के नियम

  • एकादशी को चावल और अनाज न खाएं
  • आंवले के वृक्ष की पूजा अवश्य करें
  • ब्रह्मचर्य और सत्य का पालन करें
  • क्रोध, लोभ और मोह से बचें
  • रात्रि जागरण करें
  • दशमी को एक समय भोजन करें
  • द्वादशी पारण समय पर करें

✅ क्या खाएं

  • आंवले का मुरब्बा या आंवले का रस
  • ताज़े फल (केला, सेब, अनार)
  • सेंधा नमक वाले फलाहारी व्यंजन
  • साबूदाना खिचड़ी या खीर
  • कुट्टू या सिंघाड़े का आटा
  • दूध, दही और मेवे
  • शकरकंद और आलू (सेंधा नमक)

❌ क्या न खाएं

  • चावल और चावल से बने पदार्थ
  • गेहूं और अन्य अनाज
  • प्याज, लहसुन
  • मांस, मछली, अंडा
  • दालें और फलियां
  • सामान्य नमक
  • तामसिक और बासी भोजन

आमलकी एकादशी व्रत कथा के लाभ

  • करोड़ों जन्मों के पापों का नाश होता है
  • एक सहस्र गोदान के समान पुण्य मिलता है
  • रोगों का नाश होता है (आंवला आरोग्यकारी है)
  • मोक्ष की प्राप्ति होती है
  • वैकुंठ धाम में स्थान मिलता है
  • पितरों को सद्गति प्राप्त होती है
  • धन, यश और कीर्ति में वृद्धि होती है

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आमलकी एकादशी पर आंवले के वृक्ष की पूजा क्यों करते हैं?

आंवले (आमलकी/धात्री) के वृक्ष में भगवान विष्णु का वास माना जाता है। पद्म पुराण के अनुसार आंवले का वृक्ष भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इस वृक्ष के नीचे पूजा करने से विष्णु पूजा का पूर्ण फल मिलता है।

यदि आंवले का वृक्ष उपलब्ध न हो तो क्या करें?

यदि आंवले का वृक्ष उपलब्ध न हो तो आंवले के फल को पूजा स्थान पर रखकर पूजा करें। आंवले का चित्र भी रखा जा सकता है। मुख्य बात विष्णु भक्ति और व्रत की निष्ठा है।

आमलकी एकादशी कब मनाई जाती है?

आमलकी एकादशी प्रतिवर्ष फाल्गुन मास (फरवरी-मार्च) के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। यह होली से कुछ दिन पहले आती है और बसंत ऋतु का आरंभ होता है।

क्या आमलकी एकादशी का व्रत रोगियों के लिए लाभकारी है?

हां, आंवला आयुर्वेद में सर्वश्रेष्ठ औषधि माना जाता है। इस एकादशी के व्रत से शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों लाभ होते हैं। रोगी व्यक्ति अपनी सामर्थ्य अनुसार व्रत रख सकते हैं।

आमलकी एकादशी की कथा किस पुराण में है?

आमलकी एकादशी की कथा पद्म पुराण में वर्णित है। इसमें राजा चैत्ररथ के राज्य में आंवले के वृक्ष के नीचे एक शिकारी को अनजाने में मुक्ति मिलने की कथा है।

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