वरूथिनी एकादशी व्रत कथा
Varuthini Ekadashi Vrat Katha
संक्षिप्त उत्तर
वरूथिनी एकादशी वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है। "वरूथिनी" का अर्थ है "रक्षा करने वाली।" यह व्रत भगवान विष्णु के वामन अवतार को समर्पित है। इस व्रत से भयंकर पापों से रक्षा होती है और दस सहस्र वर्षों के तप के समान पुण्य मिलता है।
वरूथिनी एकादशी व्रत कथा — संपूर्ण कथा
प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर एक विशाल और समृद्ध राज्य था जिसके राजा मांधाता थे। राजा मांधाता इक्ष्वाकु वंश के महान राजा थे — धर्मात्मा, प्रजावत्सल और भगवान विष्णु के परम भक्त। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी और धर्म का पालन होता था।
एक समय राजा मांधाता के राज्य पर एक भयंकर संकट आया। अकाल पड़ा, नदियां सूख गईं, फसलें नष्ट हो गईं। प्रजा भूख और प्यास से व्याकुल हो गई। राजा ने अनेक यज्ञ और हवन कराए, देवताओं की पूजा की, किंतु कोई उपाय काम नहीं आया। राज्य में चारों ओर हाहाकार मच गया।
राजा मांधाता अत्यंत चिंतित होकर वन में गए जहां अनेक ऋषि-मुनि तपस्या कर रहे थे। उन्होंने महर्षि अंगिरा के दर्शन किए और अपनी समस्या बताई — "हे मुनिवर! मेरे राज्य में भीषण अकाल है। प्रजा त्राहि-त्राहि कर रही है। कृपया कोई उपाय बताएं।"
महर्षि अंगिरा ने कहा — "हे राजन! वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी जो वरूथिनी एकादशी कहलाती है, उसका विधिपूर्वक व्रत करो। यह एकादशी भगवान विष्णु के वामन अवतार को समर्पित है। वामन भगवान ने राजा बलि से तीन पग भूमि मांगकर तीनों लोकों की रक्षा की थी। यह एकादशी भी वैसे ही रक्षा करती है।"
महर्षि ने आगे कहा — "इस एकादशी का व्रत करने से दस सहस्र वर्षों की तपस्या के समान पुण्य मिलता है। यह व्रत समस्त विपत्तियों से रक्षा करता है, भय दूर करता है और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। राजन! तुम अपनी प्रजा सहित यह व्रत करो, अवश्य ही तुम्हारा संकट दूर होगा।"
राजा मांधाता ने समस्त प्रजा सहित वरूथिनी एकादशी का व्रत किया। सभी ने एकादशी का उपवास रखा, भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की, तुलसी दल और पुष्प अर्पित किए। रात्रि भर भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन किया और प्रातःकाल विधिपूर्वक पारण किया।
वरूथिनी एकादशी के व्रत के प्रभाव से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए। आकाश में बादल घिर आए और मूसलाधार वर्षा हुई। नदियां पुनः जल से भर गईं, भूमि हरी-भरी हो गई और फसलें लहलहाने लगीं। राज्य में पुनः सुख-समृद्धि लौट आई। प्रजा ने राजा का जय-जयकार किया।
राजा मांधाता ने भगवान विष्णु को धन्यवाद दिया और राज्य में घोषणा करवाई कि प्रतिवर्ष वरूथिनी एकादशी का व्रत अवश्य किया जाए। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा — "हे राजन! जो मनुष्य वरूथिनी एकादशी का व्रत करता है, उसकी भगवान विष्णु सदा रक्षा करते हैं। न कोई संकट, न कोई भय, न कोई विपत्ति — भगवान वामन स्वयं उसकी रक्षा करते हैं।"
संदर्भ: यह कथा भविष्य पुराण में वर्णित है। महर्षि अंगिरा ने राजा मांधाता को वरूथिनी एकादशी का माहात्म्य बताया। भगवान श्रीकृष्ण ने यह कथा युधिष्ठिर को सुनाई।
ऑडियो कथा सुनें
वैशाख कृष्ण पक्ष को भगवान श्री विष्णु (वामन अवतार) की पूजा कैसे करें?
स्नान और संकल्प
प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान पर भगवान विष्णु या वामन अवतार की प्रतिमा के समक्ष बैठकर संकल्प लें — "रक्षा और कल्याण हेतु मैं वरूथिनी एकादशी का व्रत करता/करती हूं।"
वामन भगवान की पूजा
भगवान विष्णु के वामन अवतार की प्रतिमा या शालिग्राम की पंचामृत से अभिषेक करें। तुलसी दल, पीले पुष्प, चंदन और अक्षत चढ़ाएं। छोटे छत्र और लकड़ी का दंड प्रतीक के रूप में रखें।
मंत्र जाप
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" और "ॐ वामनाय नमः" मंत्रों का जाप करें। तुलसी की माला पर 108 बार जाप करें। भगवान वामन का ध्यान करें।
कथा श्रवण और आरती
वरूथिनी एकादशी की कथा का श्रवण या पाठ करें। राजा मांधाता की कथा ध्यानपूर्वक सुनें। कथा के बाद विष्णु आरती करें।
रात्रि जागरण
एकादशी की रात्रि को जागकर भगवान विष्णु का भजन करें। विष्णु सहस्रनाम, भागवत कथा या वामन अवतार की लीलाओं का वर्णन सुनें। दीपक जलाकर रखें।
द्वादशी पारण और दान
द्वादशी को पारण काल में तुलसी जल से व्रत खोलें। ब्राह्मणों को भोजन, छत्र और चरणपादुका दान करें। निर्धनों को अन्न और वस्त्र दान करें। इसके बाद स्वयं भोजन करें।
वरूथिनी एकादशी व्रत कथा में क्या सामग्री चाहिए?
📿 मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भगवान वासुदेव को नमन। वरूथिनी एकादशी पर इस मंत्र का जाप भगवान विष्णु की रक्षा कवच प्रदान करता है और साधक को समस्त भय और विपत्तियों से मुक्त करता है।
📿 अन्य मंत्र
ॐ वामनाय नमः
ॐ विष्णवे नमः
ॐ त्रिविक्रमाय नमः
वरूथिनी एकादशी व्रत कथा के नियम
- • एकादशी को चावल और सभी अनाज का त्याग करें
- • निर्जला या फलाहार व्रत रखें
- • ब्रह्मचर्य और सत्य का पालन करें
- • क्रोध, लोभ, मोह से दूर रहें
- • रात्रि जागरण अवश्य करें
- • जौ और तिल से बने पदार्थ न खाएं
- • द्वादशी पारण समय पर करें
✅ क्या खाएं
- → ताज़े फल (केला, सेब, अनार, पपीता)
- → सेंधा नमक वाले फलाहारी व्यंजन
- → साबूदाना खिचड़ी या खीर
- → कुट्टू या सिंघाड़े के आटे के व्यंजन
- → दूध, दही और मक्खन
- → मेवे (बादाम, काजू, मूंगफली)
- → शकरकंद और आलू (सेंधा नमक)
❌ क्या न खाएं
- ✗ चावल और चावल से बने व्यंजन
- ✗ गेहूं, जौ, बाजरा आदि अनाज
- ✗ प्याज, लहसुन
- ✗ मांस, मछली, अंडा
- ✗ दालें, राजमा, छोले
- ✗ सामान्य नमक
- ✗ तामसिक, मसालेदार और बासी भोजन
वरूथिनी एकादशी व्रत कथा के लाभ
- • दस सहस्र वर्षों की तपस्या के समान पुण्य मिलता है
- • समस्त भय और विपत्तियों से रक्षा होती है
- • भगवान विष्णु का रक्षा कवच प्राप्त होता है
- • अकाल, महामारी और प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा मिलती है
- • पापों का नाश और पुण्य का संचय होता है
- • धन-धान्य और समृद्धि में वृद्धि होती है
- • मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वरूथिनी एकादशी का क्या अर्थ है?
"वरूथिनी" शब्द "वरूथ" (कवच/रक्षा) से बना है, जिसका अर्थ है "रक्षा करने वाली।" यह एकादशी व्रती को सभी प्रकार की विपत्तियों और पापों से रक्षा प्रदान करती है, इसलिए इसे वरूथिनी कहते हैं।
वरूथिनी एकादशी पर वामन भगवान की पूजा क्यों करते हैं?
यह एकादशी भगवान विष्णु के वामन अवतार को समर्पित है। जिस प्रकार भगवान वामन ने तीन लोकों की रक्षा की, उसी प्रकार यह एकादशी व्रती की रक्षा करती है। वामन भगवान की पूजा से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।
वरूथिनी एकादशी कब पड़ती है?
वरूथिनी एकादशी प्रतिवर्ष वैशाख मास (अप्रैल-मई) के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। यह अक्षय तृतीया से कुछ दिन पहले आती है।
वरूथिनी एकादशी पर कौन सा दान करें?
इस एकादशी पर छत्र (छाता) दान का विशेष महत्व है क्योंकि वामन भगवान से छत्र का संबंध है। इसके अलावा चरणपादुका (जूते-चप्पल), अन्न, वस्त्र और स्वर्ण दान भी शुभ माना जाता है।
वरूथिनी एकादशी की कथा किस पुराण में है?
वरूथिनी एकादशी की कथा भविष्य पुराण में वर्णित है। इसमें राजा मांधाता की कथा है जिन्होंने महर्षि अंगिरा के मार्गदर्शन में इस व्रत को करके अपने राज्य को अकाल से बचाया।
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