विजया एकादशी व्रत कथा

Vijaya Ekadashi Vrat Katha

भगवान श्री विष्णु फाल्गुन कृष्ण पक्ष एकादशी
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संक्षिप्त उत्तर

विजया एकादशी फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। यह व्रत शत्रुओं पर विजय और कार्य में सफलता प्रदान करता है। स्वयं भगवान श्रीराम ने लंका पर आक्रमण से पहले सेतु निर्माण के समय यह व्रत किया था। विष्णु पूजा सहित यह व्रत करने से निश्चित विजय प्राप्त होती है।

विजया एकादशी व्रत कथा — संपूर्ण कथा

त्रेता युग में जब भगवान श्रीराम सीता माता की खोज में लंका जाने की तैयारी कर रहे थे, तब वे समुद्र तट पर पहुंचे। विशाल सागर को पार करने का कोई उपाय दिखाई नहीं दे रहा था। वानर सेना उत्साहित थी किंतु समुद्र पार करना असंभव प्रतीत हो रहा था।

उस समय महर्षि बकदाल्भ्य वहां पधारे। भगवान श्रीराम ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी समस्या बताई — "हे मुनिवर! मुझे लंका जाकर रावण का वध करना है और सीता को मुक्त कराना है। किंतु यह विशाल सागर कैसे पार होगा? कृपया कोई उपाय बताएं।"

महर्षि बकदाल्भ्य ने कहा — "हे राम! फाल्गुन कृष्ण पक्ष की एकादशी जो विजया एकादशी कहलाती है, उसका व्रत करो। यह एकादशी निश्चित विजय प्रदान करती है। जो भी इस एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करता है, वह संसार की किसी भी बाधा पर विजय प्राप्त करता है।"

महर्षि ने व्रत की विधि बताई — "दशमी को एक समय भोजन करो। एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान करके एक स्वर्ण या मिट्टी का घड़ा जल से भरो। उस पर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करो। षोडशोपचार पूजा करो। तुलसी, चंदन, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करो। रात्रि भर जागरण करो।"

भगवान श्रीराम ने पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान से विजया एकादशी का व्रत किया। लक्ष्मण, सुग्रीव, हनुमान और समस्त वानर सेना ने भी व्रत किया। सभी ने भगवान विष्णु की पूजा की और रात्रि भर जागरण किया। प्रातःकाल पूजा सामग्री को समुद्र में विसर्जित किया।

विजया एकादशी के व्रत के प्रभाव से भगवान श्रीराम को अद्भुत शक्ति और आत्मविश्वास प्राप्त हुआ। समुद्र पर सेतु का निर्माण हुआ — नल और नील ने पत्थरों पर श्रीराम का नाम लिखकर समुद्र में डाला और वे तैरने लगे। पूरी वानर सेना ने लंका पर कूच किया।

लंका में भीषण युद्ध हुआ। विजया एकादशी के पुण्य प्रभाव से भगवान श्रीराम ने रावण और उसकी समस्त राक्षस सेना का संहार किया। सीता माता को मुक्त कराया और अयोध्या लौटकर राज्याभिषेक किया। यह सब विजया एकादशी के व्रत का प्रताप था।

भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा — "हे राजन! जिस प्रकार श्रीराम ने विजया एकादशी के व्रत से रावण जैसे महाबली शत्रु पर विजय प्राप्त की, उसी प्रकार जो भी मनुष्य इस एकादशी का व्रत करता है, वह अपने सभी शत्रुओं पर विजय पाता है। यह एकादशी युद्ध, विवाद, परीक्षा — सभी में सफलता प्रदान करती है।"

संदर्भ: यह कथा स्कंद पुराण में वर्णित है। भगवान श्रीराम ने लंका अभियान से पूर्व समुद्र तट पर महर्षि बकदाल्भ्य के मार्गदर्शन में विजया एकादशी का व्रत किया था।

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ऑडियो कथा सुनें

फाल्गुन कृष्ण पक्ष को भगवान श्री विष्णु की पूजा कैसे करें?

1

कलश स्थापना और संकल्प

प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। एक मिट्टी या तांबे के कलश में जल भरकर उस पर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें। व्रत का संकल्प लें — "शत्रु विजय और कार्य सिद्धि हेतु विजया एकादशी व्रत करता/करती हूं।"

2

विष्णु पूजा

भगवान विष्णु की षोडशोपचार पूजा करें। पंचामृत से अभिषेक करें। तुलसी दल, पीले पुष्प, चंदन, कुमकुम और अक्षत अर्पित करें। घी का दीपक और धूप जलाएं।

3

मंत्र जाप

विष्णु मंत्र "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का 108 बार जाप करें। श्रीराम का ध्यान करते हुए "श्री राम जय राम जय जय राम" का भी जाप करें। तुलसी माला पर जाप करना शुभ है।

4

कथा पाठ और आरती

विजया एकादशी की कथा का पाठ या श्रवण करें। कथा के बाद भगवान विष्णु की आरती करें। "ॐ जय जगदीश हरे" का गायन करें।

5

रात्रि जागरण

रात्रि भर जागकर भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन करें। विष्णु सहस्रनाम, रामायण या भगवद् गीता का पाठ करें। दीपक रात्रि भर जलता रहे।

6

द्वादशी पारण और विसर्जन

द्वादशी को पारण काल में व्रत खोलें। पूजा सामग्री का नदी या जलाशय में विसर्जन करें। ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा दें। इसके बाद स्वयं भोजन करें।

विजया एकादशी व्रत कथा में क्या सामग्री चाहिए?

तांबे या मिट्टी का कलश भगवान विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम पंचामृत सामग्री तुलसी दल और पीले पुष्प चंदन, कुमकुम, अक्षत घी का दीपक और अगरबत्ती पीले फल (नैवेद्य हेतु) गंगाजल लाल वस्त्र (कलश पर बांधने हेतु) सुपारी, पान, नारियल दक्षिणा के लिए सिक्के

📿 मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

भगवान वासुदेव को नमन। यह मंत्र विजय प्राप्ति और शत्रु नाश के लिए अत्यंत प्रभावशाली है। भगवान श्रीराम ने भी इसी मंत्र का आश्रय लिया था।

📿 अन्य मंत्र

श्री राम जय राम जय जय राम

ॐ नमो नारायणाय

ॐ विजयाय नमः ॐ विष्णवे नमः

विजया एकादशी व्रत कथा के नियम

  • दशमी को एक समय सात्विक भोजन करें
  • एकादशी को चावल और अनाज बिल्कुल न खाएं
  • ब्रह्मचर्य का कठोर पालन करें
  • असत्य, निंदा और क्रोध से दूर रहें
  • रात्रि जागरण अनिवार्य है
  • दीपक को रात भर जलाए रखें
  • द्वादशी को सही समय पर पारण करें

✅ क्या खाएं

  • फल (केला, सेब, अनार, पपीता)
  • सेंधा नमक के साथ फलाहार
  • साबूदाना खिचड़ी
  • कुट्टू या सिंघाड़े के आटे के व्यंजन
  • दूध, दही, मक्खन
  • मेवे (बादाम, काजू, अखरोट, मूंगफली)
  • शकरकंद

❌ क्या न खाएं

  • चावल और चावल से बने पदार्थ
  • गेहूं, जौ, बाजरा आदि अनाज
  • प्याज, लहसुन
  • मांसाहार (मांस, मछली, अंडा)
  • दालें और फलियां
  • सामान्य (आयोडीन) नमक
  • तामसिक और बासी भोजन

विजया एकादशी व्रत कथा के लाभ

  • शत्रुओं पर निश्चित विजय प्राप्त होती है
  • कार्यों में सफलता और बाधाओं का निवारण होता है
  • न्यायालय के विवादों में अनुकूल निर्णय आता है
  • परीक्षा और प्रतियोगिता में सफलता मिलती है
  • भय और आशंका दूर होती है
  • भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है
  • अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य मिलता है

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विजया एकादशी का नाम विजया क्यों है?

इस एकादशी को "विजया" इसलिए कहते हैं क्योंकि यह निश्चित विजय प्रदान करती है। स्वयं भगवान श्रीराम ने लंका विजय से पूर्व यह व्रत किया था। इसके प्रभाव से हर प्रकार की बाधाओं और शत्रुओं पर विजय मिलती है।

विजया एकादशी कब पड़ती है?

विजया एकादशी प्रतिवर्ष फाल्गुन मास (फरवरी-मार्च) के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। यह होली से कुछ दिन पहले आती है।

क्या विजया एकादशी का व्रत नौकरी या व्यापार की सफलता के लिए कर सकते हैं?

हां, विजया एकादशी हर प्रकार की सफलता और विजय के लिए उत्तम है। चाहे नौकरी का साक्षात्कार हो, व्यापार में प्रतिस्पर्धा हो, या कोई विवाद — इस व्रत के पुण्य से अनुकूल परिणाम मिलता है।

विजया एकादशी की कथा किस पुराण में है?

विजया एकादशी की कथा स्कंद पुराण में वर्णित है। इसमें भगवान श्रीराम द्वारा लंका विजय से पूर्व इस व्रत को करने की कथा है। महर्षि बकदाल्भ्य ने श्रीराम को यह व्रत बताया था।

क्या विजया एकादशी पर विशेष दान करना चाहिए?

हां, इस दिन अन्न दान, वस्त्र दान और स्वर्ण दान का विशेष महत्व है। ब्राह्मणों को भोजन कराना और दक्षिणा देना चाहिए। कलश में भरा हुआ जल और पूजा सामग्री का विसर्जन करना चाहिए।

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